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स्वंतंत्रता के खाद ज़नतंत्रात्मक समाजवाद का स्वप्न साकार करना था । राष्ट्रसेवादल नवसमाज़ निर्मिती के, लिये कटिबध्द हो गया । 

सेवादल ने अपना सारा ध्यान केंद्रित कर दिया ऐसे कार्यकर्ताओ के निर्माण में, जो नवसमाज रचना के कार्यों को गति दे सके, समाज के विविध क्षेत्रों में निष्ठा लगन और प्रामाणिकता से कार्य कर सके। श्रमिकों के संगठनों मे, सहकार और शिक्षा के क्षेत्र में तथा राजकीय, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रो में ऐसे कितने ही कार्यकर्ता छोन्यादत्त की प्रेरणा और शिक्षा के कारण बने । सेवादल का यह एक अनन्य साधारण मुलभूत कार्यं था- जिस पर हमें नाज है । आज भी यह कार्य लगातार चल रहा है । 

सेवादलकी कार्यपद्धती

शाखा: संस्कार का प्रभावी साधन

शाखाओँ के द्वारा ही संगठन के कार्य की शुरूआत हुई । शाखा भी निरंतर नवशक्ती प्रदान कर आगे ले जाने वाली प्रवृति है । नित्य एकत्रित होना उसका मह्रत्वपूर्ण अंग है । खेल, गीत, कथाएँ, नित्य नैमित्यिक समाजसेवा और नवसमाज रचना के लिए पूरक उपकर्मो द्वारा बाल, कुमार, युवक और युवतियों के नागरिक्त्व की और नवसमाज निर्मितीकी शिक्षा दी जाती है । सेवादल की अन्य सारी प्रवृत्तियो को बल शाखाओ से हि मिलता है । अनुशासन, स्वावलंबन, संमाजसेवा, त्याग, श्रमप्रतिष्ठा, भातृभाव, मानवता के प्रति प्रेम, ध्येयनिष्ठा आदि के संस्कार सैनिकोंको दिने का जिम्मा हर शाखा का होता है ।

सेवापथक :

स्वंतंत्रता संग्रामके छिपे हुऐ सामाजिक दोष स्वंतंत्रत्ता के बाद उजागर होने लगे । जातियो का आपसी संघर्ष, जातीगतभाव, वैयक्तिक बैर, गांव गांव गुठ गुठ के मतभेद इन सबसे अपना विकराल रुप प्रकट करना शुरु किया । इस समय आपसी मतभेद और दुजाभाव दूर हटाकर जनता को मार्ग बताने की आवश्यकता थी । सेवापथक के कार्यक्रमों ने यह कार्यं किया । ज्ञान का साथ कर्म ने दिया । पसिंना बहने लगा,  गंदगियॉ हटने लगी, निरक्षरता का अंध:कार हटने लगा । लोक कलाओ का रुप निखर आया । लोकजीवन एकात्म होने लगा ।

इन्सानियात की भूली भटकी राहें ढूंढकर परस्पर सहकार्यं से विकास को और ले जाने वाले इस मार्ग की महत्ता न केवल सेवादल को, वरन देश के विचार्वांतो को भी महसूस होने लगी थी । 

कला पथक - मनोरंजन द्वारा जनशिक्ष और जनशिक्षा से नव समाज की

रचना :

राष्ट्रसेवादल के कलापथक ने जनमानसपर अपनी विशिष्ट छाप छोडी है। लोकनाट्य, लावणी, पवाडा, नृत्य, सम्हुगीत, मुकनाटय हत्यादि माध्यमों से समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, दुष्ट रुढीया, जातियता, अस्पृश्यता, ऊँचनीचता और प्रतिगामिता पर कलापथक ने प्रखर हमले किये । 

समाज की उच्चाभिरुची निर्माण करने वाला आनंद तो कलापथक ने समाज को दिया ही, साथसाथ नवसमाज रचना के लिये आवश्यक और प्रेरक ज्ञान भी दिया ।  लोकनाट्य परिभूत कर उसे प्रतिष्टा प्राप्त करा देने में क्लापथक को यश मिला । समुहगीतो को उसी ने जनप्रिय बनाया । कन्याएँ निर्भयतापूर्वक पुरुषों के साथ रंगमंच पर नाचने लगी, नाटक में अभिनय करने लगी ।  'महाराष्ट्र दर्शन' "भारत दर्शन' "आजादी का जंग' जैसे अनोखे और भव्य दिव्य कार्यक्रम सेवादल के मध्यवर्ती कलापथक ने साकार किए ।

अभ्यास वर्ग - एक अति आवश्यक प्रवृत्ती :

अभ्यास वर्ग राष्ट्रसेवादल की एक अति आवश्यक प्रवृत्ती है। ध्येयवादी विचारों का गहन अध्ययन और आसपास की परिस्थिती का सम्यक आकलन सेवादल के कार्यकर्ताओं को हो, इसलिए अभ्यास वर्ग प्रयत्नशील होते है ।

समाज में पठाण पाठन की प्रवृत्ती बढाने का कार्य अभ्यास वर्ग ने निश्चित रुप से किया है । 

शिक्षक संगठन :

सेवादल से शिक्षक नित्य संबंधित रहे और उन की सहायता से छात्रों तक सेवादल जा पहुंचे, यह प्रमुख उद्देश इस शिक्षक संगठनका रहा है ।  समाजवादी दृष्टि शिक्षाके द्वारा किस प्रकार से दी जा सकती है , इस का विचार यह संगठन करता है । छात्रों के शील संवर्धन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है ।

 

स्त्रीसंगठन :

नित्य बदलती समाज रचना में स्त्रियो की जिम्मेदारिया बढ़ रही है । परिवर्तन के लिये अब स्त्रियोका प्रबोधन आवश्यक है । समय आ पहूँचा है, जब स्त्री पुरुष के साथ कदम मिलाकर चलें, अपना कर्तृत्व प्रकट करे । उसे यह सब करने के लिये अवसर मिले, उसकी दृष्टि व्यापक को, वह स्वावलंबी हो, उसकी कार्यक्षमता बढ़कर उसमें एक आत्मविश्वास पैदा हो, इसलिये स्त्री संगठन कार्यरत है ।

 

दलपत्रिका :

राष्ट्र सेवा दलका मुखपत्र १९५३ से मासिक तौर से लगातार हो रहा है । (वार्षिक चंदा रू. १५० / -, त्रेवार्षिक चंदा रू. ४०० / -, पंचवार्षिक चंदा रू. ६०० / -

'शिबीर -संमेलन :

यह संगठन को नया बल देने वाला साधन है । राष्ट्रसेवादल की विविध प्रवृतियाँ हैं। क्षेत्र से संबंधित कार्यो में सूत्रबध्ध्ता हो, नया नेतृत्व निर्माण हो सके, इस लिये शिबीरों का उपयोग होता है । सहजीवनका आनंद मिले, कार्य की नयी दिशा प्राप्त हो इसलिये अलग अलग क्षेत्र के कार्याकर्ताओ के लिये अलग अलग शिबीर नित्यश: छुटीयो में आयोजित किए जाते हैं । हर साल लगभग ५०० शिबीर लगाये जाते हैं । ये सारे शिबिर स्वावलंबी बने,इस ओर विशेष ध्यान दिया जाता है ।

अपना झंडा अपना बोधचिन्ह :

यह झंडा प्रतीक है, सेवादल की आशा आकांक्षाओं और ध्येयनीती का । इसका लाल, निला, और धवल रंग सामाजिक क्रांती, व्यापकता और शुचित व्यक्त करने वाला है। सामाजिक क्रांति का मार्ग भी शुद्ध और शुचिर्मूत हो, यह उसका अर्थ है । यंत्रयुग के प्रतीक के नाते चक्र और श्रमिकों के प्रतीक के नाते कुदाल फावड़ा ...... . नवनिर्मिंती और श्रमनिष्ठा को प्रदर्शित करताहै ।

राष्ट्र सेवा दल के अन्य उपक्रम :

एस. एम. जोशी क्रीडा कला सकुल निळू फुले कला अकाडमी रावसाहेब पटवर्धन विद्यालय साने गुरूजी प्राथमिक विद्यालय / बालमंदिर आपलं घर (नलदुर्ग) अनाथ बालकों का पुनर्वसन

सेवा दल के पाँच मूल्य सेवा दल को न :

सारे समाज की काया बदल देने के लिए इन मूल्यों की जड़े समाज में उतारने के लिए सेवा दल कटिबद्ध है । प्रबोधन, रचना और संघर्ष इसका मार्ग है । प्रबोधन का अर्थ केवल वाचिक शिक्षा नहीं । प्रबोधन के कारण व्यक्तिगत जीवन में परिवर्तन आता है । इसी परिवर्तन के सहारे नूतन समाज रचना के लिए संगठित प्रयास करने होते हैं । नूतन समाज रचना के समय प्रस्थापितों के साथ जिनके संबंध होते हैं, उनका विरोध होता है तो संघर्ष अनिवार्य बन जाता है । बिना प्रबोधन रचना संभव नही है और बगैर रचना की निश्चिती संगठित रूप में सघर्ष हो ही नहीं सकता ।

सुद्धढ़ शरीर, कुशाग्र सतेज बुद्धि, कुशाल हाथ और कोमल ह्रदय वाले युवा युवतीयाँ ही राष्ट्र का धन है, ऐसी सेवादल को धारणा है, इस धन से भारत को संपन्न और  बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहनेमें ही सेवादल को वृन्तार्धत्ता है । हम इस कार्य में आपका हार्दिक सक्रिय सहयोग चाहते है ।